आज नवरात्र के आखिरी दिन महानवमी या दुर्गा नवमी देश भर में मनाई जा रही है इसके ठीक बाद दशहरा या विजयदशमी का पर्व मनाया जाएगा। नौ दिन तक चलने वाले नवरात्रों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। हमारे देश में जहां कुछ ही किलोमीटर पर भाषा का स्वरूप बदल जाता है ठीक वैसे ही हर जगह की परंपरा में बदलाव आ जाता है। आज हम आपको एक ऐसी ही परंपरा के बारे में बताने जा रहे हैं जो बिहार के सहरसा जिले के महिषी में स्थित ‘उग्रतारा स्थान’ पर कई सालों से चली आ रही है। यह परंपरा इसलिए भी खास है क्योंकि इसको हिन्दू-मुसलमान मिलकर पूरा करते हैं।

दरअसल, बिहार के मुख्य शक्तिस्थलों में सहरसा जिले के महिषी का ‘उग्रतारा स्थान’ बेहद प्रमुख है। उग्रतारा देवी के मंदिर को मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी भारती और आदिशंकराचार्य के शास्त्रार्थ की वजह से जाना जाता है। यहां पर कई सालों से एक परंपरा चली आ रही है जिसमें कुलदेवी की पूजा में बलि देने की परंपरा है। यह बलि कोई और नहीं खास तौर से मुसलमान ही देते आए हैं।

कुलदेवी की पूजा में बकरे और मुर्गे दोनों की बलि दी जाती है। इसके बिना देवी पूजा संपन्न नहीं होती। बलि देने के लिए किसी मुसलमान को बुलाया जाता है उन्हे सम्मान पूर्वक नये कपड़े और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। इस परंपरा के पीछे कई कहानियां हैं। ऐसा माना जाता है कि कुलदेवी ज्वालामुखी के द्वारपाल ‘बाला पीर’ थे और उनके लिये ही मुर्गे की बलि दी जाती है।